रिपब्लिक चैनल बना अखाड़ा कोई “भाला तो कोई तीर- रॉकेट” लेकर पहुंचा डिबेट में देखें मजेदार वीडियो

कुछ न्यूज़ चैनलों को देखकर लगता है कि कॉमेडी शो देखना बंद कर देना चाहिए और न्यूज़ चैनल ही देखना चाहिए क्योंकि कुछ न्यूज़ चैनल कॉमेडी शो से कम नहीं. लोग अक्सर ये शिकायत करते हैं कि टीवी चैनलों पर रोजाना बहस के नाम पर पता नहीं क्या होता है। और इन बहसों का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। ये बताता है कि देश में सार्वजनिक संवाद की हालत कैसी हो गई है। उधर कई बार पब्लिक ये सोचती है कि क्या ऐसी बहसें मीडिया और पार्टियों का एक मिला जुला डब्ल्यूडब्ल्यूएफ है।

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रही है जिसमें रिपब्लिक भारत के पत्रकार अर्णब गोस्वामी उनके शो “पूछता है भारत” में कुछ पैनलिस्ट से सवाल जवाब हो रही है सवाल जवाब के नाम पर सिर्फ हंगामा ही हो रहा है कुछ पैनलिस्ट तो तीर लेकर डिबेट कर रहे हैं तो कुछ पैनलिस्ट राकेट दिखा रहे हैं मानो कि सारा पाकिस्तान हिंदुस्तान का युद्ध यहीं पर हो जाएगा.

पत्रकार उमाशंकर सिंह ने एक ट्वीट किया है जिसमें उन्होंने लिखा है
“इस टीवी बहस को देखने के बाद आपको लगेगा कि बिना किसी एडिटर के फ़िल्टर या गेटकीपर वाला सोशल मीडिया फिर भी कम गंदा है। इस कथित मेन स्ट्रीम मीडिया ने उत्तेजना के स्तर को इस हद तक बढ़ाया है कि आगे आने वाले शो में शिरकत करने वाले पेनलिस्ट्स एक दूसरे को चाँटा मार मार कर बहस किया करेंगे”.

कुछ राष्ट्रवादी चैनलों को तो देखकर लगता है बॉर्डर पर सेना को नहीं बल्कि इन्हीं पत्रकारों को भेज देना चाहिए.

देश में सार्वजनिक बहस का स्तर लगातार गिर रहा है। देश टीवी की खिड़की में टंगा दिख रहा है। देश में करीब 400 न्यूज चैनल है। जिनके लिए खबर महंगी, बहस सस्ती हो गई है। इन बहसों में तर्क की जगह हल्ला ही दिखता है। चैनलों पर सार्थक बहस के बजाए शोर-शराबा ज्यादा होता है। एक दूसरे पर कीचड़ उछालने की कोशिश होती है। ऐसे में सवाल ये है कि देश में सार्वजनिक बहस का स्तर कौन गिरा रहा है? राजनीतिक पार्टियों के नेता गंभीर बहस नहीं चाहते? प्रवक्ता आधी-अधूरी तैयारी के साथ आते हैं? बहस के गिरते स्तर के लिए मीडिया कितना जिम्मेदार? 

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