भारतीय मीडिया की विश्वसनीयता गिरी 180 देशों की सूची में 140 में स्थान पर

दुनिया भर में प्रेस स्वतंत्रता खतरे में है मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा जाता रहा है लेकिन अब लोकतांत्रिक देशों में भी उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं| भारत देश का अपवाद नहीं है| मोदी की पहचान एक संवाद में माहिर नेता की है लेकिन कुर्सी पर बैठने के बाद से अब तक उन्होंने एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं कि किसी लोकतंत्र के प्रधानमंत्री द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस करना मीडिया पर किए जाने वाला एहसान नहीं है बल्कि सरकार की जिम्मेदारी है|

राजनीतिक दलों और मीडिया में बढ़ती यारी– हर साल 3 मई को प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है इस साल का मुद्दा मीडिया और लोकतंत्र का रिश्ता है लोकतंत्र में मीडिया की आलोचनात्मक भूमिका पर कोई विवाद नहीं रहा है लेकिन पिछले सालों में उसकी भूमिका पर सवाल उठाए जाने लगे| उसे लोकतंत्र में सूचना का माध्यम या सरकारी नीतियों की आलोचनात्मक विवेचना का वाहक समझने के बदले राजनीतिक दलों और राजनीतिज्ञों के समर्थन या विरोध का मन समझने जाने लगा है भारत इसका अपवाद नहीं है प्रेस स्वतंत्रता इंडेक्स में 180 देशों की सूची में उसका स्थान 140 वां है| मीडिया से जुड़े लोग इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं कहीं उसे प्रेस्टीट्यूट कहकर बदनाम किया जा रहा है तो कहीं गोदी मीडिया का कर सोशल मीडिया ने इस संकट को और बढ़ाया है|

लोकतंत्र सत्ता के विभाजन के सिद्धांत पर टिका है लोकतंत्र का चौथा पाया कहे जाने वाले मीडिया की जिम्मेदारी मुद्दों को सामने लाने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में योगदान लोकतंत्र सिर्फ 5 साल के लिए नए राज्य शासक का चुनाव नहीं है लोकतंत्र लोगों की भागीदारी के साथ उनके अपने जीवन के आयोजन की व्यवस्था है यह भागीदारी सिर्फ चुनाव के समय नहीं बल्कि सारे समय सुनिश्चित करना हर सरकार संसद और हर न्यायपालिका की जिम्मेदारी है इसमें मीडिया की भूमिका को नकारना लोकतंत्र को कमजोर ही करेगा इसलिए मीडिया पर आलोचना की निगाह रखते हुए उसकी आजादी को सुनिश्चित करना हर लोकतांत्रिक नागरिक की जिम्मेदारी और नागरिकों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए मीडिया और मीडिया कर्मियों को भी अपनी प्रतिबद्धता बढ़ानी होगी देने और लोगों की भागीदारी को सुनिश्चित करने की है लेकिन पिछले कुछ सालों से मीडिया राजनीतिक दलों के साथ चल रही है|

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के सदस्यों से सत्ता में बैठे लोगों के साथ यारी बढ़ने की उम्मीद नहीं की जाती उनसे यह भी उम्मीद नहीं की जाती कि वह प्रधानमंत्री को यह दिलासा देते रहे कि “ऑल इज वेल” यानी सब कुछ अच्छा है लेकिन फिर भी कई मीडिया कर्मियों के इस रास्ते पर चलने की संभावना हमेशा बनी रहती है| मोदी से दोस्ताना ताल्लुक रखने वाले कुछ पत्रकारों ने पिछले कुछ समय से यह दलील देनी शुरू की है कि उदारवादी मीडिया प्रधानमंत्री को व्यक्तिगत तौर पर निशाना बनाता है एक बेहद केंद्रीकृत प्रधानमंत्री के इर्द-गिर्द सिमटे शासन में ऐसा होना लाजमी है इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है|

लेकिन अब ऐसा लगता है कि हम एक नए भारत में रह रहे हैं जहां कुछ वर्षों में प्रेस और सरकार के दायित्व और मायने में इतने आश्चर्यजनक रफ्तार से बदलाव आया है कि लोकतंत्र में चौथे खंभे की जरूरत पर कुछ मीडिया द्वारा ही सवाल उठाए जा रहे हैं| जरा इन तथ्यों पर भी गौर कीजिए मोदी की पहचान एक संवाद में माहिर नेता की है लेकिन 26 मई 2014 को कुर्सी पर बैठने के बाद से अब तक उन्होंने एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की है किसी लोकतंत्र के प्रधानमंत्री द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस करना स्वतंत्र मीडिया पर किया जाने वाला एक एहसान नहीं बल्कि या सरकार के सबसे बड़ी जिम्मेदारी है सत्ता से सवाल पूछना स्वतंत्र प्रेस का अधिकार है लेकिन पिछले कुछ वर्षों से मीडिया राजनीतिक दलों के साथ सांठगांठ करके चल रही|

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