35 साल तक भीख मांग कर खाए हैं प्रधानमंत्री मोदी, मगरमच्छ के बच्चे को पकड़ कर ले आए थे घर

मुख्य बातें

  1. एक इंटरव्यू में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा मैंने 35 साल भिक्षा मांग कर खाया
  2. नरेंद्र मोदी ने स्टेशन पर चाय बेची हालांकि RTI से खुलासा हुआ कि उनके चाय बेचने का कोई रिकॉर्ड नहीं है
    3.जब नरेंद्र मोदी छोटे थे तो वह मगरमच्छ के बच्चे को पकड़ कर ले आए थे घर
  3. सन्यासी बनना चाहते थे पीएम मोदी

दरअसल लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने इंडिया टुडे और तक को दिए एक इंटरव्यू में यह बात कही थी प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कोई भरोसा नहीं करेगा लेकिन मैं 35 साल तक भिक्षा मांगकर खाया हूं बेशक यह बात किसी के गले नहीं उतरेगी।

प्रधानमंत्री ने कहा, मेरे जीवन का एक नियम है जो शायद लोगों के भी काम आ सके. जीवन में एक व्यक्ति ऐसा होना चाहिए जिसे पता न हो कि आपकी उस पर साख है. आपके मन में जो भी विचार आए, अच्छा या बुरा, उससे जरूर बताना चाहिए.

प्रधानमंत्री ने आगे कहा, चंडीगढ़ आने की सूचना किसी को नहीं थी. वहां पहुंचने के बाद मैंने एक कार्यकर्ता को फोन किया, वो भी रेलवे स्टेशन से. मैं वहां से चला और चंडीगढ़ में एक गैराज में रहने लगा. बाद में दिल्ली आया. मैं चंडीगढ़ 5 साल रहा, मैं कभी गुजरात टेलीफोन भी नहीं करता था. मेरी आदत है कि मैं जहां हूं वहां डूब जाता हूं. प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, मुझे प्रकृति बहुत पसंद है. मेरा जीवन नदियों और पहाड़ों में बना है. आज भी उस जिंदगी को जीना पसंद करता हूं लेकिन वो संभव नहीं रहा. मेरे पास त्याग करने के लिए कुछ है भी नहीं. बस मेरी इच्छा है जिसे मैंने त्याग कर दिया.

चाय और खाना बनाने के सवाल पर प्रधानमंत्री ने कहा, कोई भरोसा नहीं करेगा लेकिन मैं 35 साल तक भिक्षा मांग कर खाया हूं. ये बात किसी के गले नहीं उतरेगी. मैं कहीं बता कर नहीं जाता था. वहां जाने पर खाना मिला तो खा लेता था, वर्ना चला आता था. ऐसे मैं जिया हूं. कभी पार्टी के काम से देर से आया तो खिचड़ी बना कर खा लेता था. हिमालय की जिंदगी पूरा कर जब मैं वापस आया तो अहमदाबाद के मणिनगर में डॉ हेडगेवार भवन में सफाई करता था. वहां मेरा काम यही था सुबह 5 बजे उठना, झाड़ू और पोछा लगाना फिर सबके लिए चाय बनाना और 5.20 पर सबको उठाना.

प्रधानमंत्री ने कहा, हमारे यहां आरएसएस में प्रातः स्मरण होता है. हम वहां सभी महापुरुषों का स्मरण करते थे. वहां सबको चाय परोसता था, उसके बाद शाखा चला जाता था. उधर आकर सबके लिए नाश्ता बनाता था. पोहे वगैरह बनाना मुझे बहुत पसंद है. पोहे सबको खिलाता था. सुबह अखबार पढ़ने के बाद किसी के घर खाना खाने चला जाता था. ऐसी जिंदगी मैंने दो ढाई साल बिताई थी.

प्रधानमंत्री ने कहा कि ऐसी जिंदगी न तो संघर्ष की थी और न ही कठिनाई बल्कि ये जिंदगी की मेरी इच्छा थी. मेरे जीवन का एक नियम है जो शायद लोगों के भी काम आ सके. जीवन में एक व्यक्ति ऐसा होना चाहिए जिसे पता न हो कि आपकी उस पर साख है. आपके मन में जो भी विचार आए, अच्छा या बुरा, उससे जरूर बताना चाहिए. एक व्यक्ति जीवन में ऐसा जरूर होना चाहिए जिससे कुछ भी न छुपाया जाए. मेरे जीवन में ऐसा एक व्यक्ति है जिसका नाम नहीं बताऊंगा. मैं उसको बातों बातों में कह देता हूं कि मेरे साथ ऐसा हुआ. वो व्यक्ति जरूरी नहीं कि बड़ा हो, पढ़ा लिखा हो. वो आपको कभी ऐसी चीज बता देगा जो शायद बहुत बड़ा पंडित भी नहीं बताएगा.

नरेंद्र मोदी बचपन में अक्सर तालाब में तैरने जाया करते थे। एक बार वे तालाब से मगरमच्छ का बच्चा उठा ले आए। मोदी ने घर पर कहा-छोटा सा बच्चा था, इसलिए लगा कि ले चलना चाहिए तो उठाकर ले आया। घर पहुंचे तो परिवार वाले देखकर हतप्रभ रह गए। समझाया तो वापस छोड़कर आ गए।

मां ने पहले डांटा फिर समझाया

लेकिन नरेंद्र जब उस मगरमच्छ के बच्चे को पकड़ कर अपनी मां हीराबा के पास गए तो उनकी मां ने पहले तो उन पर गुस्सा किया लेकि बाद में समझाते हुए उनसे कहा कि इसे वापस छोड़कर आओ, बच्चे को कोई यदि मां से अलग कर दे तो दोनों को ही परेशानी होती है, मां की ये बात नरेंद्र मोदी को समझ आ गई और वो उस मगरमच्छ के बच्चे को वापस सरोवर में छोड़ आए।

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