अब दिल्ली मेट्रो को भी लीज पर देने की तैयारी में सरकार?

आने वाले वक्त में सरकार दिल्ली मेट्रो को भी लीज पर दे सकती है। इस पर विचार विमर्श शुरू हो गया है और सरकार के थिंक टैंक नीति आयोग ने इसके लिए एक खाका भी तैयार करके सरकार को भेज दिया है।

आयोग को उम्मीद है कि अगर उसके इस ड्राफ्ट पर अमल किया गया, तो दिल्ली मेट्रो को लीज पर देने से सरकार की जेब में 39 हजार करोड़ रुपये से लेकर 80 हजार करोड़ रुपये आ सकते हैं। हालांकि आयोग की इस योजना पर कितना अमल होगा, इस पर सरकार को ही फाइनल फैसला लेना होगा।

उल्लेखनीय है कि कोलकाता मेट्रो को छोड़ दें तो आधुनिक मेट्रो की शुरुआत दिल्ली मेट्रो से ही हुई थी और फिलहाल इसका लगभग साढ़े तीन सौ किमी. का नेटवर्क है। अब तक तैयार हुए दिल्ली मेट्रो के पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगभग 70 हजार करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं और अभी इसका नेटवर्क और बड़ा करने के लिए सरकार को मोटी रकम की जरूरत होगी।

आयोग ने इसी वजह से ही सरकार को सुझाया है कि लीज पर देकर उसे जो रकम मिलेगी, उससे जाइका से लिए गए कर्ज की भी भरपाई हो जाएगी और बाकी रकम से आगे का नेटवर्क तैयार करने के लिए भी सरकार को इक्विटी के तौर पर अपनी जेब से पैसा नहीं देना पड़ेगा। नीति आयोग ने दिल्ली मेट्रो को लीज पर देने के लिए तीन मॉडल सुझाए हैं। इनमें से एक मॉडल 20 साल के लिए दूसरा 50 और तीसरा 99 साल की लीज पर देने के लिए है।

\Bमॉडल नंबर एक \B

नीति आयोग का कहना है कि इस मॉडल के तहत सिर्फ ट्रैक इंफ्रास्ट्रक्चर और ट्रेनें 20 साल के लिए किसी प्राइवेट कंपनी को लीज पर दे दी जाएं। इस तरह से प्राइवेट कंपनी ही ट्रेनें चलाएगी और देखरेख करेगी। बदले में वह यात्री किराए से आने वाली रकम, पार्किंग से आने वाली राशि और ट्रेनों में होने वाले विज्ञापनों से पैसा कमाएगी। आयोग का मानना है कि इतना करने भर से ही सरकार को 39 हजार 236 करोड़ रुपये की रकम मिल सकती है।

\Bमॉडल नंबर दो

\Bइस मॉडल के तहत ट्रैक, ट्रेनें ही नहीं, बल्कि स्टेशनों का कमर्शल एरिया, कमर्शल प्रापर्टी का अधिकार भी प्राइवेट कंपनी को दिया जाए। प्राइवेट कंपनी को ये 50 साल के लिए दिया जाए। इस तरह से प्राइवेट कंपनी किराए, पार्किंग, विज्ञापनों के अलावा कमर्शल प्रापर्टी के किराए और उसे डिवेलप करके पैसा कमा सकेगी। इस मॉडल से सरकार को 69 हजार 996 करोड़ रुपये मिल सकते हैं।

\Bमॉडल नंबर तीन

\Bइस मॉडल के तहत मेट्रो का पूरा सिस्टम 50 की बजाय 99 साल की लीज पर दिया जाएगा। दूसरे और तीसरे नंबर के मॉडल में एक मुश्त रकम के अलावा सरकार, प्राइवेट कंपनी से उसके मुनाफे में से कुछ हिस्सा भी ले सकेगी। इस तरह से इस मॉडल के तहत सरकार को 80 हजार 333 करोड़ रुपये की रकम मिल सकती है।

\Bदिल्ली मेट्रो का क्या?\B

अगर सरकार ने इस ड्राफ्ट को स्वीकार कर लिया और अमल हुआ तो उस स्थिति में दिल्ली मेट्रो एक अथॉरिटी की तरह ही काम करेगी और जब लीज अवधि समाप्त होगी, तो लीज पर दिया गया पूरा सिस्टम वापस इस अथॉरिटी को मिल जाएगा। दिल्ली मेट्रो में अगर सरकार का यह प्रयोग कामयाब हुआ, तो जाहिर है कि भारी भरकम लागत वाले अन्य मेट्रो प्रोजेक्ट में भी सरकार इसी दिशा में आगे बढ़ सकती है। लेकिन इस मामले में कुछ पेंच ऐसे हैं, जिन पर सरकार को फैसला लेना होगा।

मसलन, अभी दिल्ली मेट्रो में यात्री से कितना किराया लिया जाए, यह एक कमिटी तय करती है। अगर मेट्रो नेटवर्क लीज पर दिया गया तो किराया सरकार तय करेगी या प्राइवेट कंपनी। अगर यह अधिकार प्राइवेट कंपनी को दिया गया तो सरकार को मेट्रो एक्ट में बदलाव करना होगा।

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