लॉकडाउन: भारत बिना सोची-समझी रणनीति की कीमत चुका रहा है

जिस तरह से मोदी सरकार ने नोट बंदी के लिए अचानक से फैसले लिए तब लोग है रातों रात सड़कों पर आ गए थे इनमें कुछ लोगों की मौत भी हुई थी. उसी तरह लॉक डाउन के लिए भी मोदी सरकार ने अचानक से ही फैसले किए जिनका खामियाजा आज भारत भुगत रहा है.

जब भारत में कोरोना संक्रमण के 500 केस थे तब Lockdown किया गया और जब अब भारत में करीब दो लाख COVID-19 के केस होने वाले हैं तब लॉक डाउन में ढील दे दी गई. जब Lockdown का ऐलान किया गया तब भारत के प्रधानमंत्री मोदी फ्रंटफुट पर थे लेकिन जैसे-जैसे संक्रमण का मामला बढ़ता गया वैसे मोदी सरकार ने राज्य सरकार को जिम्मेदारी सौंप दी.

चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों की तीन जानी-मानी संस्थाओं ने कोरोना महामारी की रोकथाम के लिए सरकार के क़दमों की कड़ी आलोचना की है.

इन संस्थाओं का कहना है कि बिना सोची-समझी लागू की कई नीतियों के कारण देश मानवीय त्रासदी और महामारी के फैलाव के मामले में भारी क़ीमत अदा कर रहा है.

संस्थाओं ने कहा है कि बेहद सख़्त तालाबंदी के बावजूद न सिर्फ़ कोरोना के मामले दो महीने में 606 से बढ़कर एक लाख अड़तीस हज़ार से अधिक (मई 24 तक) हो गए हैं बल्कि अब ये ‘कम्युनिटी ट्रांसमिशन’ के स्टेज पर है.

भारत सरकार महामारी के कम्युनिटी ट्रांसमिशन के स्टेज पर पहुंचने की बात से इनकार करती रही है.

रविवार को जारी बयान में हस्ताक्षरकर्ताओं में सरकार की कोविड-19 नेशनल टास्क फोर्स के महामारी विशेषज्ञ समूह के प्रमुख डॉक्टर डीसीएस रेड्डी और एक अन्य सदस्य डॉक्टर शशि कांत भी शामिल हैं.

इसके अलावा एम्स, बीएचयू और चंडीगढ़ स्थित पीजीआईएमईआर के कई पूर्व और वर्तमान प्रोफ़ेसर और स्वास्थ्य के क्षेत्र की जानी मानी हस्तियों ने भी इस बयान पर अपनी मुहर लगाई है.

कोविड-19 से निपटने के लिए राष्ट्रीय टास्क फ़ोर्स के गठन का ऐलान अप्रैल के दूसरे सप्ताह में किया गया था.

प्रवासी मज़दूरों और ग़रीबों पर असर

सरकार ने जिस तरह सिर्फ़ चार घंटे की मोहलत में पहले लॉकडाउन की घोषणा की थी, उसकी आलोचना होती रही है. इसकी भी आलोचना होती रहै है कि इस कारण प्रवासी मज़दूरों और ग़रीबों को काफ़ी तकलीफ़ उठानी पड़ी.

इस बयान में कहा गया है कि लॉकडाउन ने कम से कम 90 लाख दिहाड़ी मज़दूरों के पेट पर लात मारी है.

भोजन के अधिकारों के लिए काम करनेवाली संस्था – राइट टू फ़ूड के मुताबिक़ तालाबंदी के चलते 22 मई तक देश भर में भूख, दुर्घटना और इस तरह के कई कारणों से 667 मौतें (कोरोना बीमारी से अलग) हो चुकी हैं.

राइट टू फ़ूड ने ग़रीबों पर आई आपदा और सरकार के कथित ‘संवेदनाहीन’ रवैए के विरोध में एक जून यानी सोमवार को शोक दिवस के रूप में मनाने का आह्वान किया है.

इंडियन पब्लिक हेल्थ एसोसिएशन की जनरल सेक्रेटरी डॉक्टर संघमित्रा घोष ने बीबीसी से कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चिकित्सकों और स्वास्थ्य क्षेत्र के विशेषज्ञों की एक टीम को कोविड-19 पर विचारों के आदान-प्रदान के लिए 24 मार्च को बुलाया था लेकिन लगता है कि लॉकडाउन को लेकर फ़ैसला पहले ही हो चुका था

डॉक्टर संघमित्रा घोष ने कहा कि लॉकडाउन आख़िरी रास्ता होना चाहिए था लेकिन सरकार अपना मन बना चुकी थी.

बयान में भी लॉकडाउन को ‘निष्ठुर’ बताया गया है और कहा गया है कि ‘इसका फ़ैसला शायद उस बहुत ही रसूख़ रखनेवाली उस संस्था के प्रभाव में लिया गया जिसने कोरोना से दुनियां भर में 22 लाख मौतों का दावा किया था लेकिन धीरे-धीरे साबित हो गया है कि ये अनुमान ग़लत था’ और अगर सरकार ने महामारी विशेषज्ञों की राय ली होती तो शायद इस मामले में बेहतर प्लानिंग की जा सकती थी.

कहा गया है कि अगर प्रवासी मज़दूरों को शुरू में जाने दिया गया होता जब बीमारी का फैलाव कम था तो बेहतर होता लेकिन अब ये लोग इसे वैसी जगहों पर भी ले जा सकते हैं जहाँ ये पहले मौजूद नहीं था.

इंडियन पब्लिक हेल्थ एसोसिएशन के अलावा इंडियन एसोसिएशन ऑफ़ प्रिवेंटिव एंड सोशल मेडिसिंस और इंडिन एसोसिएशन ऑफ एपिडेमिओलॉजिस्ट के इस बयान को प्रधानमंत्री नेरंद्र मोदी, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डाक्टर हर्षवर्धन के साथ-साथ तमाम राज्य सरकारों को भेजा गया है.

सुझाव

इन स्वास्थ्य संस्थाओं ने सरकार को कई सुझाव दिए हैं, जिनमें केंद्र, राज्य और ज़िला स्तर पर स्वास्थ्य क्षेत्र के विशेषज्ञों और समाजशास्त्रियों की टीम का गठन करने, कोविड से जुड़े डेटा तक आसानी से पहुँच, लॉकडाउन ख़त्म करने और क्लस्टर बंदी लागू किए जाने और अस्पतालों को आम लोगों के लिए खोले जाने जैसी बातें शामिल हैं.

सरकार ने लॉकडाउन के चौथे चरण से ही धीरे-धीरे ढील देनी शुरू कर दी थी, जिसमें फैक्ट्रियों तक को खोलने की इजाज़त मिल गई थी और अब तो जून से कई और तरह की आर्थिक गतिविधियाँ शुरू करने की अनुमति दे दी गई है.

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