अगर आप भी किराए के मकान में रह रहे हैं तो फिर यह खबर आपके लिए बेहद ही खास होने वाला है! किराए पर घर दे रहे मकान मालिक को सुप्रीम कोर्ट ने पिछले हफ्ते ही एक बड़ा झटका देते हुए एक बहोत ही अहम फैसला सुना दिया है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक अगर मालिक अपनी अचल संपत्ति को दूसरे के कब्जे से वापस लेने के लिए निर्धारित समय सीमा के अंदर कोई कदम नहीं उठा पाता है तो फिर उसका मालिकाना हक बिल्कुल खत्म हो जाएगा और फिर उस अचल संपत्ति पर जिसने भी कब्जा कर रखा है उसी को कानूनी तौर पर मालिकाना हक दे दिया जाएगा!

आपको बता दें कि देश के सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद यूपी की राजधानी लखनऊ के लोगों में संशय की स्थिति को बढ़ा दिया गया है ऐसे मकान मालिक जिन्होंने अपनी कोई संपत्ति किराए पर दे रखी है वह इस पर अपनी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं! ऐसे में उन सभी का ये कहना है कि यह फैसला तो मकान मालिकों के लिए एक बहुत ही बड़ा झटका है। इस फैसले से उन को बेहद दुख पहुंचा है. जबकि दूसरी ओर किरायेदारों ने अपनी प्रतिक्रिया में खुशियों को भी जाहिर किया है!

बता दे कि देश के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के निवासी और उन्हें का कहना है कि मकान मालिकों को अब बहुत ही सतर्क रहना पड़ेगा कोर्ट के इस फैसले के बाद अपना मकान किराए पर देने से पहले मकान मालिकों को सारी प्रक्रिया को भी पूरी करनी पड़ेगी! मकान किराए पर देने से पहले हाउस एग्रीमेंट, रेंट, बिजली का बिल, पानी का बिल जैसी कार्रवाई करनी बेहद महत्वपूर्ण है !

जिससे कि उनके मकान में रहने वाले किराएदार मकान के ऊपर कब्जे को लेकर कोई भी दावा ना कर सके तो वही आलमबाग के सर्वेश के मुताबिक उन्होंने अपनी दुकान काफी समय से किराए पर दे रखी है। तब अब वह तुरंत सारी कार्यवाही द्वारा चेक करवाएंगे! उनका यह भी कहना है कि दूसरे लोग सरकार के इस फैसले से कुछ सबक ले और साथ ही अगर अचल संपत्ति पर किसी ने कब्जा जमा लिया है तो फ़िर उसे वहां से हटाने में बिल्कुल भी देरी नहीं करें!

हालांकि आपको बता दें कि देश की सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में यह भी पूरी तरह से साफ किया है कि सरकारी जमीन पर अतिक्रमण को इस दायरे में नहीं रखा जाएगा यानी कि सरकारी जमीन पर कब्जे को कभी भी कानूनी मान्यता नहीं मिल सकती है। साथ ही वहां पर किसी के द्वारा चाहे जितना भी पुराना कब्जा क्यों ना हो! इसलिए सरकार संपत्ति के मामलों को इस फैसले से जोड़कर बिल्कुल भी नहीं देखा जाए!