अभी तो आपने टीवी डिबेट में सिर्फ पैनलिस्ट को गाली देते हुए देखा है लेकिन वह दिन दूर नहीं जब एंकर और पैनलिस्ट दोनों तरफ से ही गाली देंगे. कई बार तो टीवी पर हाथापाई की नौबत भी आ चुकी है. अब हाथापाई से आगे टीवी डिबेट बहुत आगे बढ़ चला है भारत का भले ही विकास ना हो रहा हो पर न्यूज़ चैनलों का विकास एकदम से आसमान छू रहा है अभी तक तो टीवी डिबेट में अपने मादर** सुना था अब उसके बाद दूसरे शब्द Bhosd* का इस्तेमाल हो गया है. अगर आपके घर में कोई हाई ब्लड प्रेशर या फिर लो ब्लड प्रेशर वाले मरीज हैं तो उन्हें टीवी के भड़काऊ डिबेट मतलब चीखने चिल्लाने वाले एंकर के डिबेट से दूर रखें.

हिंदी टीवी पत्रकारिता के कुचर्चित नाम दीपक चौरसिया ने नया कारनामा कर दिया है. इस एंकर ने अपने शो में ऐसी गाली-गलौज कराई है कि सुनने वाले भी शरमा जाएं. दीपक के सौजन्य से न्यूज नेशन चैनल के दर्शकों ने भोस*के गाली भी सुन लिया.
जब ये गाली दी जा रही थी तो दीपक चौरसिया का चेहरा दमक रहा था, जैसे उसकी अधूरी इच्छी पूरी हो रही हो… इस मुद्दे पर युवा पत्रकार दीपांकर पटेल ने फेसबुक पर जो लिखा है, उसे देखें

Deepankar Patel
टीवी में मादरचो* सुन लिया था!
अब “भोसड़ीके” सुनिए…
और जब प्रेम शुक्ल सुअर सुअर कर रहे थे,
तब दीपक चौरसिया ने उन्हें कैसे रोका ये जरूर देखिए…

http://www.facebook.com/story.php?story_fbid=4134591596615616&id=100001944493576&scmts=scwspsdd&extid=9F3PoI52YHI31YM2

हाल ही में रिपब्लिक टीवी पर एक पैनलिस्ट ने मादर** कहा

हाल ही की एक टीवी डिबेट के दौरान दूसरे पैनलिस्ट को मां-बहन की गाली तक दे डाली वहीं उनका यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। दरअसल रिपब्लिक टीवी पर हाल ही में एक डिबेट के दौरान उनके साथ पैनलिस्ट के रूप में हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) के प्रावक्ता दानिश रिजवान को मां की गाली दे डाली। वुछ लोग जीडी बख्शी को सही बताते हुए उनका पक्ष ले रहे हैं और उन्हें रॉक स्टार बता रहे हैं। जबकि कईं लोग टीवी पर भाषायी मर्यांदा का उल्लंघन करने को लेकर उनकी आलोचना कर रहे हैं। शनिवार को पीिड़त हम के प्रावक्ता रिजवान ने बख्शी के खिलाफ एफआईंआर दर्ज किए जाने और उन्हें गिरफ्तार करने को लेकर मांग उठाईं।

देश में सार्वजनिक बहस का स्तर लगातार गिर रहा है। देश टीवी की खिड़की में टंगा दिख रहा है। देश में करीब 400 न्यूज चैनल है। जिनके लिए खबर महंगी, बहस सस्ती हो गई है। इन बहसों में तर्क की जगह हल्ला ही दिखता है। चैनलों पर सार्थक बहस के बजाए शोर-शराबा ज्यादा होता है। एक दूसरे पर कीचड़ उछालने की कोशिश होती है। 

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