मोदी सरकार के ऊपर 782 करोड़ रुपए का बोझ, मनरेगा में काम करने वाले मजदूरों को नहीं दे पाए मजदूरी

नई दिल्ली: वैश्विक महामारी के दौरान प्रवासी मजदूर अपने घर को लौटे और उस समय मोदी सरकार ने कहा कि उनको हम मनरेगा के तहत रोजगार देंगे लेकिन अब गरीबों की जिंदगी मुसीबत में गिरती नजर आ रही है क्योंकि अब सरकार के पास रोजगार मुहैया कराने के लिए योजना नहीं है लेकिन सरकार मनरेगा में इसका समाधान ढूंढ रही है लेकिन इसमें सरकार के लिए मुसीबत हो सकती है क्योंकि सरकार ने कई सौ करोड़ रुपए कि मनरेगा मजदूरी का भुगतान नहीं किया है.

भारत देश में जब महामरी ने दस्तक दी तो उन गरीबों की जिंदगी मुसीबत में घिर गई जो मजदूरी कर दो वक्त की रोटी ही चाहते थे स्वास्थ्य मुसीबत ने करोड़ों लोगों का रोजगार ले लिया सरकार ने इस समस्या को दूर करने की जगह मनरेगा में इसका समाधान ढूंढा लेकिन सरकार यहां भी नाकाम ही रही.

क्योंकि मोदी सरकार ने कई सौ करोड़ रुपए का मनरेगा मजदूरी का भुगतान ही नहीं किया है खुद केंद्र सरकार ने संसद में इस बारे में जानकारी दी है सरकार ने बताया है कि 10 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में करीब 782 करोड़ रुपए की मनरेगा मजदूरी का अभी तक भुगतान नहीं किया गया है यहां आक़रे 11 सितंबर 2020 तक के हैं.

केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने लोकसभा में जो जानकारी दी है उसके मुताबिक आंध्र प्रदेश हिमाचल प्रदेश झारखंड मध्य प्रदेश मिजोरम पंजाब उत्तर प्रदेश पश्चिम बंगाल और पांडिचेरी में कई मनरेगा कामगारों की मजदूरी बाकी है.

इस सूची में पहले नंबर पर पश्चिम बंगाल है जहां इन 10 राज्यों में कुल लंबित राशि का करीब 50 फ़ीसदी है पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा 397.57 करोड़ों रुपए की मनरेगा मजदूरी का भुगतान नहीं हुआ है.

दूसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश आता है जहां 121.78 करोड़ रुपए की मनरेगा मजदूरी लंबित है वहीं पंजाब में भी मनरेगा मजदूरों के 63.86 करोड रुपए की वेतन का अब तक भुगतान नहीं किया गया है.

मध्यप्रदेश में 59.23 करोड़ रुपए मनरेगा मजदूरी लंबित है वही हिमाचल प्रदेश में भी मनरेगा मजदूरों को 46.73 करोड़ रुपए का भुगतान किया जाना अभी बाकी है।

झारखंड में 26.86 करोड़ रुपए का भुगतान बाकी है आंध्र प्रदेश में 22.83 करोड़ रुपए कि मनरेगा मजदूरी का भुगतान अभी तक नहीं किया गया है.

केंद्र शासित प्रदेश पांडिचेरी में भी मनरेगा मजदूरों के 74.12 लाख रुपए सरकार पर बकाया है सरकार की यह हालत तब है जब महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना यानी मनरेगा मांग आधारित मजदूरी रोजगार कार्यक्रम है जिसमें मजदूरी भुगतान नियमित आधार पर किया जाता है।

महामारी के चलते पैदा हुए संकट के समाधान के लिए मोदी सरकार ने आत्मनिर्भर भारत योजना के तहत मनरेगा योजना के बजट में 40 हजार करोड़ रुपए की बढ़ोतरी की थी जबकि पहले यह राशि 61.500 करोड़ रुपए थी जिसके बाद वित्तीय वर्ष 2020-21 के लिए मनरेगा योजना का बजट बढ़ कर 1 लाख करो रुपए हो गया।

हाल ही में कई रिपोर्ट सामने आया है कि मनरेगा का बजट बहुत तेजी से खत्म हो रहा है मौजूदा वित्त वर्ष के करीब 5 महीने में ही मनरेगा का 64 फ़ीसदी बजट खत्म हो चुका है।

एक रिपोर्ट में यह भी पता चला है कि 9 सितंबर 2020 तक काम मांगने वाले 1 लाख 55 करोड़ लोगों को काम नहीं मिल पाया था रिपोर्ट के मुताबिक जिन राज्य में रोजगार नहीं मिला 8 सितंबर तक उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा काम मांगने वाले 35.01 लाख लोगों को मनरेगा के तहत काम नहीं मिला है मध्यप्रदेश में 19.38 लाख, पश्चिम बंगाल में 13.03 लाख, राजस्थान में 13.78 लाख, छत्तीसगढ़ में 11.74 लाख और बिहार में 9.98 लाख लोगों को मनरेगा के तहत रोजगार नहीं मिला है।

दरअसल अभी के आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल 2020 से लेकर अब तक मनरेगा के तहत 85लाख नए जॉब कार्ड जारी किए गए हैं जो पिछले 7 सालों की तुलना में सबसे ज्यादा है लेकिन कई सारे ऐसे राज्य हैं जो मजदूरों को 100 दिनों का काम दिलाने में काफी पीछे हैं और सरकार भुगतान करने में पीछे है।

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